पाठ्यक्रम: GS2/ अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अज़रबैजान यात्रा, ऑपरेशन सिंदूर को लेकर उत्पन्न मतभेदों के बाद भारत-अज़रबैजान संबंधों को पुनः सामान्य बनाने के प्रयास का संकेत देती है।
पृष्ठभूमि
- ऑपरेशन सिंदूर का प्रभाव: भारत द्वारा किए गए सैन्य अभियान के बाद अज़रबैजान ने तुर्किये के साथ मिलकर पाकिस्तान के प्रति समर्थन व्यक्त किया था। इसके लिए उसने ‘थ्री ब्रदर्स’ गठबंधन का उदाहरण दिया।
- कश्मीर मुद्दा: अज़रबैजान निरंतर यह पक्ष रखता रहा है कि जम्मू-कश्मीर विवाद का समाधान अंतरराष्ट्रीय कानून तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रासंगिक प्रस्तावों के अनुसार किया जाना चाहिए।
- भू-राजनीतिक संरेखण: पाकिस्तान के साथ अज़रबैजान के घनिष्ठ रणनीतिक संबंध हैं, क्योंकि पाकिस्तान ने नागोर्नो-काराबाख संघर्ष में अज़रबैजान का समर्थन किया है।
- इसके विपरीत, भारत ने आर्मेनिया के साथ अपने संबंधों को विशेष रूप से रक्षा सहयोग के क्षेत्र में अधिक सुदृढ़ किया है।
- अज़रबैजान ने भारत पर आर्मेनिया को सैन्य समर्थन प्रदान करने का आरोप लगाया है।
हालिया राजनयिक संवाद
- व्यापार एवं निवेश: दोनों पक्षों ने व्यापार तथा ऊर्जा सहयोग के विस्तार की संभावनाओं की पहचान की और व्यापक आर्थिक सहभागिता की संभावनाओं को स्वीकार किया।
- ऊर्जा सहयोग: चर्चा में तेल एवं ऊर्जा क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ करने के साथ-साथ आर्थिक साझेदारी के अतिरिक्त क्षेत्रों की संभावनाओं का पता लगाने पर ध्यान केंद्रित किया गया।
- संपर्क एवं परिवहन: दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के संबंध में अधिक निकट समन्वय स्थापित करने पर सहमति व्यक्त की।
- क्षमता निर्माण: भारत ने भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग (ITEC) कार्यक्रम में अज़रबैजान के पेशेवरों की भागीदारी बढ़ाने का प्रस्ताव रखा।
भारत-अज़रबैजान संबंधों का संक्षिप्त विवरण
- राजनयिक संबंध: भारत ने दिसंबर 1991 में अज़रबैजान को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता प्रदान की। यह मान्यता अज़रबैजान द्वारा सोवियत संघ से स्वतंत्रता घोषित किए जाने के तुरंत बाद दी गई थी।
- दोनों देशों के बीच फरवरी 1992 में औपचारिक रूप से राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
- आर्थिक संबंध: दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार वर्ष 2005 में लगभग 50 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2022 में 1.882 बिलियन अमेरिकी डॉलर के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया, जो सुदृढ़ आर्थिक सहभागिता को दर्शाता है।
- इसके बाद के वर्षों में व्यापार में गिरावट आई और वर्ष 2025 में यह घटकर 401 मिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया। इसका प्रमुख कारण भारत द्वारा कच्चे तेल के आयात में कमी आना था।
- भारत अज़रबैजान को औषधियाँ, चावल, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद तथा निर्माण सामग्री जैसी विविध वस्तुओं का निर्यात करता है।
- ऊर्जा सहयोग: ओएनजीसी विदेश लिमिटेड अज़रबैजान में तेल एवं गैस क्षेत्रों तथा पाइपलाइन परियोजनाओं में निवेश बनाए हुए है।
- कंपनी ने अज़ेरी-चिराग-गुनाशली तेल क्षेत्र तथा बाकू-त्बिलिसी-जेहान पाइपलाइन में हिस्सेदारी अर्जित की है।
- यह सहयोग भारत के ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने के प्रयासों में योगदान देता है तथा रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कैस्पियन क्षेत्र में भारत की सहभागिता को बढ़ाता है।
- सांस्कृतिक संबंध: दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों का एक प्रमुख उदाहरण बाकू स्थित 18वीं शताब्दी का ‘अतेशगाह’ अग्नि मंदिर है। यहाँ देवनागरी और गुरुमुखी लिपियों में अभिलेख मिलते हैं, जो ऐतिहासिक व्यापारिक संबंधों को दर्शाते हैं।
- मानवीय सहयोग: ईरान पर अमेरिका-इज़राइल के हमलों के दौरान अज़रबैजान ने 200 से अधिक भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने में सहायता प्रदान की।
- अज़रबैजान में भारतीय समुदाय में लगभग 1,000 लोग शामिल हैं, जो विभिन्न व्यावसायिक एवं पेशेवर क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
भारत के लिए अज़रबैजान का महत्त्व
- भौगोलिक स्थिति: अज़रबैजान यूरोप, रूस, मध्य एशिया तथा कैस्पियन क्षेत्र के चौराहे पर स्थित है।
- संपर्क एवं परिवहन: अज़रबैजान अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह गलियारा भारत को रूस, मध्य एशिया और यूरोपीय बाजारों तक पहुँचने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराता है।
- ऊर्जा सुरक्षा: अज़रबैजान कैस्पियन क्षेत्र का एक प्रमुख ऊर्जा उत्पादक देश है तथा भारत की ऊर्जा साझेदारियों का विस्तार करने की पर्याप्त क्षमता रखता है।
द्विपक्षीय संबंधों में चुनौतियाँ
- कश्मीर मुद्दे पर दोनों देशों के बीच मतभेद द्विपक्षीय संबंधों में तनाव का एक प्रमुख कारण बने हुए हैं।
- पाकिस्तान के साथ अज़रबैजान के घनिष्ठ रणनीतिक संबंध दोनों देशों के बीच विश्वास निर्माण की प्रक्रिया में चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं।
आगे की राह
- अज़रबैजान के साथ भारत की सहभागिता एक व्यावहारिक एवं बहु-संरेखित विदेश नीति दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय हितों के बीच संतुलन स्थापित करना है।
- संबंधों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया राजनयिक तनावों के समाधान में संवाद तथा पारस्परिक समायोजन के महत्त्व को रेखांकित करती है।
- अपेक्षा है कि दोनों देश स्थिर एवं दूरदर्शी साझेदारी विकसित करने के लिए पूर्ववर्ती मतभेदों की तुलना में दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देंगे।
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